जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र में फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को निर्देश जारी करते हुए जन्म और मृत्यु पंजीकरण के नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
नए निर्देशों के अनुसार, अब 1 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र जिला मजिस्ट्रेट (DM), अनुमंडल मजिस्ट्रेट (SDM) या उनके द्वारा नामित अधिकारी की अनुमति के बाद ही जारी किया जाएगा। इस फैसले का उद्देश्य फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनाने की घटनाओं पर रोक लगाना और पंजीकरण प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।
1 साल बाद जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जरूरी होगी अनुमति
पहले यह नियम 10 साल से अधिक समय बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाने पर लागू होता था। अब इसे और सख्त करते हुए 1 साल की समय सीमा तय कर दी गई है। यानी यदि किसी बच्चे का जन्म एक वर्ष के भीतर पंजीकृत नहीं होता है, तो बाद में प्रमाणपत्र बनवाने के लिए संबंधित अधिकारी की मंजूरी लेनी होगी।
राज्यों को दिए गए सख्त निर्देश
महारजिस्ट्रार कार्यालय ने सभी राज्यों से कहा है कि राज्य और जिला स्तर पर गठित समितियों की नियमित बैठकें कराई जाएं और पूरे सिस्टम की लगातार निगरानी की जाए। बताया जा रहा है कि इस संबंध में पहले भी निर्देश भेजे गए थे, लेकिन कई राज्यों में उनका प्रभावी पालन नहीं हुआ। इसी कारण दोबारा सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए गए हैं।
निजी अस्पतालों के लिए भी नया निर्देश
निजी अस्पतालों को भी निर्देश दिया गया है कि किसी भी जन्म या मृत्यु की सूचना 21 दिनों के भीतर संबंधित रजिस्ट्रार को देना अनिवार्य होगा। समय पर जानकारी नहीं देने पर संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
फर्जी पंजीकरण पर रहेगी कड़ी नजर
केंद्र सरकार ने उन पंजीकरण इकाइयों की पहचान करने को कहा है, जहां अचानक असामान्य संख्या में जन्म या मृत्यु पंजीकरण हो रहे हैं। ऐसे मामलों की जांच कर फर्जीवाड़े पर कार्रवाई की जाएगी।
साथ ही अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने लॉगिन आईडी और ओटीपी किसी के साथ साझा न करें। इसके लिए जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा।
डिजिटल रिकॉर्ड से पहले होगी पूरी जांच
आम लोगों द्वारा जमा किए गए हस्तलिखित जन्म प्रमाणपत्रों को अब बिना जांच के डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जाएगा। पहले संबंधित जन्म-मृत्यु रजिस्टर से मिलान किया जाएगा और रजिस्टर का संबंधित पेज अपलोड कर जिला रजिस्ट्रार से मंजूरी ली जाएगी। अनुमोदन मिलने के बाद ही रिकॉर्ड को डिजिटल किया जाएगा।
आंगनबाड़ी की भूमिका भी जांच के दायरे में
घर पर होने वाले प्रसव के मामलों में आंगनबाड़ी सेविकाओं की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। नियमों के अनुसार सेविका के सत्यापन के बाद ही कई मामलों में जन्म प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।
अब यह भी जांच की तैयारी है कि यदि घर में बच्चे का जन्म हुआ, तो इसकी सूचना समय पर स्वास्थ्य विभाग को क्यों नहीं दी गई। जानकारों का मानना है कि निष्पक्ष जांच होने पर इस पूरे मामले में बड़े स्तर पर फर्जीवाड़े का खुलासा हो सकता है।



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